गरुण पुराण








धर्म, संस्कृ्ति व संस्कार 

This appeared in  स्वप्निल सौंदर्य ई-ज़ीन :  Vol- 01, Issue- 04 , Jan- Feb  2014





गरुण पुराण :

ठारह महापुराणों में ' गरुणमहापुराण ' का अपना एक विशेष महत्त्व है . जैसे देवों मेम जनार्दन श्रेष्ठ हैं और आयुधों में सुदर्शन चक्र श्रेष्ठ है, वैसे ही पुराणों में गरुण्पुराण हरि के तत्वनिरुपण में मुख्य कहा गया है . जिस मनुष्य के हाथ में यह गरुणमहापुराण विद्यमान है, उसके हाथ में नीतियों का कोश है. जो मनुष्य इस पुराण का पाठ करता है अथवा इसको सुनता है , वह भोग और मोक्ष - दोनों को प्राप्त कर लेता है.
इस पुराण के स्वाध्याय से मनुष्य को शास्त्र - मर्यादा के अनुसार जीवनयापन की शिक्षा मिलती है . जन-सामान्य में एक भ्रान्त धारणा है कि गरुणमहापुराण मृ्त्यु के उपरांत केवल  मृ्तजीव के कल्याण के लिए सुना जाता है , जो सर्वथा गलत है. यह पुराण अन्य पुराणों की भाँति नित्य पठन- पाठन और मनन का विषय है . इसका स्वाध्याय अनन्त पुण्य की प्राप्ति के साथ भक्ति - ज्ञान  की वृ्द्धि में अनुपम सहायक है .

गरुण पुराण के अनुसार मृ्त्यु का स्वरुप :

मृ्त्यु ही काल है , उसका समय आ जाने पर जीवात्मा से प्राण और देह का वियोग हो जाता है . मृ्त्यु अपने समय पर आती है. मृ्त्यु कष्ट के प्रभाव से प्राणी अपने किये कर्मों को एक्दम भूल जाता है. जिस प्रकार वायु मेघमण्डलों को इधर-उधर खींचता है, उसी प्रकार प्राणी काल के वश में रहता हिअ. सात्विक, राजस और तामस - ये सभी भाव काल के वश में हैं. प्राणियों में वे काल के अनुसार अपने - अपने प्रभाव का विस्तार करते हैं. सूर्य , चंद्र , शिव, वायु, इन्द्र , अग्नि, आकाश, पृ्थ्वी, मित्र , औषधि , आठों वसु, नदी, सागर और भाव - अभाव - ये सभी कालके अनुसार यथासमय उद्भूत होते , बढ़ते हैं, घटते हैं और मृ्त्यु के उपस्थित होने पर काल के प्रभाव से विनष्ट हो जाते हैं.

जब मृ्त्यु आ जाती है तो उसके कुछ समय पूर्व दैवयोग से कोई रोग प्राणी के शरीर में उत्पन्न हो जाता है . इन्द्रियाँ विकल हो जाती हैं और बल, ओज तथा वेग शिथिल हो जाता है. प्राणियों को करोड़ों बिच्छूओं के एक साथ काटने का अनुभव होता है, उससे मृ्त्युजनित पीड़ा का अनुमान करना चाहिये. उसके बाद ही चेतना समाप्त हो जाती है, जड़ता आ जाती है. तदनन्तर यमदूत उसके समीप आ कर खड़े हो जाते हैं और उसके प्राणों को बलात अपनी ओर खींचना शुरु कर देते हैं. उस समय प्राण कण्ठ में आ जाते हैं. मृ्त्यु के पूर्व मृ्तक का रुप बीभत्स  हो उठता है . वह फेन उगलने लगता है. उसका मुँह लार से भर जाता है . उसके बाद शरीर के भीतर विद्यमान रहने वाला वह अंगुष्ठपरिमाण का पुरुष हाहाकार करता हुआ तथा अपने घर को देखता हुआ यमदूतों के द्वारा यमलोक ले जाया जाता है.

जो लोग झूठ नहीं बोलते , जो प्रीतिका भेदन नहीं करते , आस्तिक और श्रद्धावान हैं, उन्हें सुखपूर्वक मृ्त्यु प्राप्त होती है . जो काम, ईर्ष्या और द्वेष के कारण स्वधर्म का परित्याग  न करे, सदाचारी और सौम्य हो, वे सब निश्चित ही सुखपूर्वक मरते हैं.

जो लोग मोह और अज्ञान का उपदेश देते हैं , वे मृ्त्यु के समय महाअंधकार में फँस जाते हैं. जो झूठी गवाही देने वाले, असत्यभाषी , विश्वासघाती और वेदनिन्दक हैं, वे मूर्च्छारुपी मृ्त्यु को प्राप्त करते हैं. उनको ले जाने के लिए लाठी एवं मुद्गर से युक्त दुर्गंध से भरपूर एवं भयभीत करने वाले दुरात्मा यमदूत आते हैं. ऐसी भयंकर परिस्थिति  देखकर प्राणी के शरीर में भयवश कँपन होने लगती है . उस समय वह अपनी रक्षा के लिए अनवरत माता- पिता और पुत्र को यादकर करुण - क्रंदन करता है . उस क्षण प्रयास करने पर भी ऐसे जीव के कण्ठ से एक शब्द भी स्पष्ट नहीं निकलता . भयवश प्राणी की आँखे नाचने  लगती हैं. उसकी साँस बढ़ जाती है और मुँह सूखने लगता है . उसके बाद वेदना से आविष्ट होकर वह अपने शरीर का परित्याग करता है और उसके बाद ही वह सबके लिए अस्पृ्श्य एवं घृ्णायोग्य हो जाता है.




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This apeared in  स्वप्निल सौंदर्य ई-ज़ीन :  Vol- 01, Issue- 5 ,  March - April 2014




गरुण पुराण -   नर्कों का स्वरुप  :


रुण पुराण में  नरकों के विभिन्न स्वरुप् व भेदों के बारे में विस्तृ्त जानकारी दी गई हैं, जिनमें जाकर पापी जन अत्यधिक दुख एवं कष्ट भोगते हैं. गरुण पुराण के अनुसार नर्क तो हज़ारों की संख्या में हैं, जिनकी चर्चा असंभव है परंतु मुख्य - मुख्य नर्कों की विवेचना निम्नवत है :

'रौरव ' नामक नर्क अन्य सभी की अपेक्षा प्रधान है. झूठी गवाही देने वाला और झूठ बोलने वाला व्यक्ति रौरव नामक नर्क में जाता है. इसका विस्तार दो हज़ार योजन है . जाँघभर की गहराई में वहाँ दुस्तर गड्ढा है. दहकते हुए अंगारों से भरा हुआ वह गड्ढा पृ्थ्वी के समान बराबर ( समतल भूमि - जैसा) दिखता है. तीव्र अग्नि से वहाँ की भूमि भी तप्तांगार जैसी है. उसमें यम के दूत पापियों को डाल देते हैं. उस जलती हुई अग्नि से संतप्त होकर पापी उसी में इधर उधर भागता है . उसके पैर में छाले पड़ जाते हैं, जो   फूट्कर बहने लगते हैं. रात दिन वह पापी वहाँ पैर उठा- उठा कर चलता है. इस प्रकार वह जब हज़ार योजन उस नर्क का विस्तार पार कर लेता है, तब उसे पाप की शुद्धि के लिए उसी प्रकार के दूसरे नर्क में भेजा जाता है.

'महारौरव ' नामक नर्क पाँच हज़ार योजन में फैला हुआ है. वहाँ की भूमि ताँबे के समान वर्णवाली है . उसके नीचे अग्नि जलती रहती है. वह भूमि विद्युतप्रभा के समान कांतिमान है. देखने में वह पापी जनों को महा भयंकर प्रतीत होती है. यमदूत पापी व्यक्ति के हाथ -पैर बाँधकर उसे उसी में लुढ़्का देते हैं और वह लुढ़कता हुआ उसमें चलता है. मार्ग में कौआ, बगुला, भेड़िया, उलूक , मच्छर और बिच्छू आदि जीव-जन्तु क्रोधातुर होकर उसे खाने के लिए तत्पर रहते हैं. वह उस जलती हुई भूमि एवं भयंकर जीव - जन्तुओं के आक्रमण से इतना संतप्त हो जाता है कि उसकी बुद्धि ही भ्रष्ट हो जाती है. वह घबड़ाकर चिल्लाने लगता है तथा बार- बार उस कष्ट से बेचैन हो उठता है. उसको वहाँ कहीं पर भी शांति प्राप्त नहीं होती है. इस प्रकार इस नरकलोक के कष्ट भोगते हुए पापी के जब हज़ारों वर्ष बीत जाते हैं, तब कहीं जाकर मुक्ति प्राप्त होती है.

इसके बाद जो नरक है , उसका नाम  ' अतिशीत' है. वह स्वभावत: अत्यंत शीतल है . महारौरव नरक के समान ही उसका भी विस्तार बहुत लंबा है. वह गहन अंधकार से व्याप्त रहता है. असह्य कष्ट देने वाले यमदूतों के द्वारा पापीजन लाकर यहाँ बाँध दिये जाते हैं. अत: वे एक दूसरे का आलिंगन करके वहाँ की भयंकर ठंड से बचने का प्रयास करते हैं. उनके दाँतों में कटकटाहट होने लगती है . उनका शरीर वहाँ की ठंड से काँपने लगता है. वहाँ भूख- प्यास बहुत अधिक लगती है. इसके अतिरिक्त भी अनेक कष्टों का सामना उन्हें वहाँ करना पड़्ता है . वहाँ हिमखण्ड का वहन करनेवाली वायु चलती है, जो शरीर की हड्डियों को तोड़ देती है. वहाँ के प्राणी भूख से त्रस्त होकर मज्जा, रक्त और गल रही हड्डियों को खाते हैं. परस्पर भेंट होने पर वे सभी पापी एक दूसरे का आलिंगन कर भ्रमण करते रहते हैं. इस प्रकार उस तमसावृ्त नरक में मनुष्य को बहुत से कष्ट झेलने पड़ते हैं.


जो व्यक्ति अन्यान्य  असंख्य पाप करता है , वह इस नरक के अतिरिक्त ' निकृ्न्तन ' नाम से प्रसिद्ध दूसरे नरक में जाता है. वहाँ अनवरत कुम्भकार के चक्र के समान चक्र चलते रहते हैं, जिनके ऊपर पापीजनों को खड़ा करके यम के अनुचरों के द्वारा अँगुलि में स्थित कालसूत्र से उनके शरीर को पैर से लेकर शिरोभाग तक छेदा जाता है. फिर भी उनका प्राणान्त नहीं होता . इसमें शरीर के सैकड़ों भाग टूट- टूट कर छिन्न - भिन्न हो जाते हैं और पुन: इकट्ठे हो जाते हैं. इस प्रकार यमदूत पापकर्मियों को वहाँ हज़ारों वर्ष तक चक्कर लगवाते रहते हैं. जब सभी पापों का विनाश हो जाता है , तब कहीं जाकर उन्हें उस नरक से मुक्ति प्राप्त होती है. 


- ऋषभ शुक्ल
 ( संस्थापक - संपादक )


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Presented and Posted By -

Swapnil Shukla









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