Laavanya ~ The Dancing Dolls of India :: I ( Kathak Dancer Richa Jain )





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Laavanya ~ The Dancing Dolls of India :: I
K A T H A K   D A N C E R 
‘ R I C H A   J A I N ’
( From the Desk of Swapnil Saundarya e zine )


  



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लावण्य , सौंदर्य व हुनर का पर्याय :: ऋचा जैन

नृ्त्य मन के उल्लास को  प्रकट करने का एक सहज , स्वाभाविक और उत्कृ्ष्ट साधन है. बच्चा जब प्रसन्न होता है तो वह स्वत: हाथ - पैर इधर - उधर हिलाकर नाचने लगता है और वह प्रसन्न उस समय होता है जब उसे अपने मन की वस्तु प्राप्त हो जाती है . अत: यह कहना किसी भी प्रकार से अतिशयोक्ति न होगा कि आनंद की अभिव्यक्ति नृ्त्य को जन्म देती है. ध्यान रहे कि केवल हाथ - पाँव चलाने को नृ्त्य कला नहीं कहते . उसे सुंदरता और नियमबद्ध तरीके से करने पर ही नृ्त्य, कला का रुप लेता है. और जब नृ्त्य के साथ गायन - वादन दोनों होता है तो नृ्त्य का सौंदर्य बढ़ जाता है. आठ विभिन्न शास्त्रीय नृ्त्यों में कथक नृ्त्य को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है . कथक नृ्त्य उत्तर प्रदेश , बिहार, बंगाल , मध्य प्रदेश, राजस्थान , पंजाब आदि प्रांतों में प्रचलित है. यह उत्तर प्रदेश का शास्त्रीय नृ्त्य है. कथक शब्द की उत्पत्ति कथा से हुई और ' कथनं करोति कथक:' अर्थात जो कथन करता है वह कथक है . वैसे तो अन्य नृ्त्यों में भी कथानक होते हैं किंतु कथक नृ्त्य में कथा प्रधान है , इसलिए इसे कथक की संज्ञा दी गई है. कथक की प्राचीन परंपरा है . महापुराण, महाभारत तथा नाट्यशास्त्र में भी कथक शब्द मिलता है . पाली शब्द कोष में कथको एक उपदेशक के लिए प्रयुक्त किया गया है. मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की खुदाई में नृ्त्य करती हुई स्त्रियों की जो मूर्तियाँ प्राप्त हुईं हैं उनकी मुद्राओं से कथक नृ्त्य का आभास होता है.


प्राचीन काल में कथावाचकों द्वारा मंदिरों में पौराणिक कथाएं हुआ करती थीं . कथा के बाद जब कीर्तन होता था तो नट लोग जिन्हें भरत कहते थे, नृ्त्य करते थे. कुछ समय के बाद नट जाति के लोगों में बुराइयाँ आ जाने के कारण उनका समाज में बहिष्कार सा हो गया . अत: इन नटों ने स्वयं कथा कह - कह कर नृ्त्य करना आरंभ कर दिया जिससे उनकी जीविका चलती रहे . यही नट बाद में कत्थक या कथक कहलाने लगे. नृ्त्य के शास्त्रीय सिंद्धातों से परिचित वे भगवान की लीलाओं का नृ्त्य प्रधान नाटक व स्वाँग किया करते थे. अत: भक्त - समुदाय से उन्हें यश और धन दोनों प्राप्त होता रहा . बाद में यह नृ्त्य मुख्यत: राजदरबारों से संबंधित रहा, अत: श्रृंगार और अलंकारप्रियता इसकी विशेषता हो गई. इस नृ्त्य में तबला- पखावज से संगति की जाती है. नर्तक  तैयारी के साथ पैरों की गति से तबला- पखावज के बोलों को निकालते हैं. इसमें अधिकतर परंपरागत कृ्ष्ण चरित्र का चित्रण किया जाता है.




आज के समय में कथक नृ्त्य के क्षेत्र में नृ्त्यांगनाओं का बड़ा वर्चस्व है. नई प्रतिभाओं के साथ नृ्त्य विद्या का यह विस्तार सुखद है . इस कड़ी में नृ्त्यांगना ऋचा जैन ( Kathak Dancer Richa Jain ) का नाम कथक नृ्त्य के क्षेत्र में किसी पहचान का मोहताज़ नहीं .

लावण्य, सौंदर्य और बेमिसाल प्रतिभा का दूसरा नाम  ऋचा जैन ( Kathak Dancer Richa Jain )  को कहना अनुपयुक्त न होगा. कथक परिवार में जन्मीं ऋचा जैन को यह कला अपने माता- पिता से विरासत में मिली है. ऋचा जैन ने कथक नृ्त्य के क्षेत्र में अपनी औपचारिक शिक्षा मात्र तीन वर्ष की आयु से पिता श्री रवि जैन जी व माँ श्रीमती नलिनी जैन जी के मार्गदर्शन में प्रारंभ की. माँ नलिनी जैन व पिता पंड़ित रवि जैन जयपुर एवं लखनऊ घराने की नृ्त्य शैली के स्थापित कलाकार थे. अत: इनके नृत्य में जयपुर और लखनऊ दोनों घरानों की खूबियाँ सम्मिलित हैं जो दर्शकों को मंत्रमुग्ध करने में सक्षम हैं. कथक नृ्त्य के हर पहलुओं व पक्षों पर कड़ी पकड़ व विशिष्ट्ता रखने वाली ऋचा जैन का नृ्त्य अत्यंत मनमोहक व सौंदर्यपरक है . ऋचा जैन ( Kathak Dancer Richa Jain )  के नृ्त्य कौशल की तारीफ़ करना सूर्य को दिया दिखाने समान लगता है .
भगवान कृ्ष्ण की लीलाओं से जुड़े कई कथा - प्रसंगों का कथक जैसे जटिल नृ्त्य के साथ संरचना , लाजवाब व प्रशंसनीय है. तबले की तालों पर इनके पाँव की थिरकती गतियाँ , भावाभिव्यक्ति , अंग संचालन और लयकारी की संगत देखते ही बनती है.






कथक नृ्त्य ( Kathak Dance ) के अतिरिक्त ऋचा जैन ( Richa Jain )  ने पंडि़त अजीत कुमार मिश्रा और ए महेश्वर राव से शास्त्रीय संगीत की विधिवत शिक्षा ग्रहण की.  ऋचा जैन नृ्त्य करने के साथ बंदिशों व गीतों को गाती भी हैं जिसके फलस्वरुप इनकी प्रत्येक प्रस्तुति प्रभावशाली व भेदकारी बन पड़ती है.
बात चाहे चक्करदार तिहाई में चक्करों के प्रयोग की हो या जयपुर घराने के थाट , आमद, तोड़े, टुकड़े व तत्कार को तीन ताल में पेश करना हो या एक परन के द्वारा 6 मात्रा में 16 मात्रा के तीन ताल के जटिल  अंदाज़ को दर्शाना हो, ऋचा जैन की नृ्त्य कला लाजवाब , बेमिसाल एवं अत्यंत रोचक सिद्ध होती है और इनका हर अंदाज़ अत्यंत मोहक व आकर्षक होता है.


ऋचा जैन ( Kathak Dancer Richa Jain ) , राणा चूड़ावत और  रानी हाड़ा की जीवन गाथा को कथा वाचन शैली में पेश कर दर्शकों की आपार प्रशंसा बटोर चुकी हैं. देश की संस्कृ्ति , परंपरा व शास्त्रीय नृ्त्य एवं संगीत को सहेजने की दिशा में कथक नृ्त्यांगना ऋचा जैन ( Kathak Dancer Richa Jain )  कहती हैं कि अपनी संस्कृ्ति को आने वाली पीढ़ी के लिए सहेज कर रखना तभी संभंव है जब उसे रुचिकर तरीके से नई पीढ़ी तक पहुँचाया जाए . नई पीढ़ी को देश की परंपरा और संस्कृ्ति से रुबरु कराने के लिए उनके साथ समय बिताना होगा. अभिभावकों को चाहिये कि वे बच्चों को संस्कृ्ति से जुड़ी प्रदर्शनी या धरोहर दिखाएं.इस तरह छोटे-छोटे तरीकों से बच्चों को देश की परंपरा से रुबरु करा सकते हैं. वाट्सएप , फेसबुक पर बच्चों संग जुड़ें तो उन्हें इंटरनेट से शास्त्रीय नृ्त्य- संगीत की जानकारी लेकर साँझा करने को कहें.





कथक नृ्त्यांगना ऋचा जैन  ( Kathak Dancer Richa Jain )  दूरदर्शन , आल इंडिया रेडियो के साथ ही आई सी सी आर ( ICCR )  की कलाकार भी हैं. ये 2008 से ही देश के विभिन्न प्रतिष्ठित  मंचों और कार्यक्रम में अपने हुनर का प्रदर्शन कर रही हैं. इन्हें 2009 में सुर - श्रृंगार समसद मुंबई द्वारा ' श्रृंगार मणि ' से सम्मानित किया गया. ऋचा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से वाणिज्य विषय में परास्नातक की उपाधि प्राप्त की है.





कथक नृ्त्यांगना ऋचा जैन  ( Kathak Dancer Richa Jain )  के विलक्षण व्यक्तित्व को व उनकी प्रतिभा को बयां करने में शब्द शायद कम पड़ जाएं . पता नहीं स्वप्निल सौंदर्य ई-ज़ीन के विशेष कॉलम के ज़रिये ऋचा जैन  को आप सभी पाठकों के कितना निकट ला पाया हूँ . कथक नृ्त्यांगना ऋचा जैन के व्यक्तित्व व कथक नृ्त्य  के क्षेत्र में उनके योगदान के बारे में लिखते हुए ऐसा महसूस हुआ कि ऋचा जी का नृ्त्य  के प्रति समर्पण अदभुत है . अपने में खो जाना ही तो , कभी किसी का हो जाना है " ...... कथक नृ्त्यांगना ऋचा जैन  ( Kathak Dancer Richa Jain )  ने नृ्त्य कला को अपने व्यक्तित्व में इस प्रकार समा लिया है और उसमें खो के वे नृ्त्य की एक बेहतरीन व प्रतिभावान पर्याय बन गई हैं. स्वप्निल सौंदर्य ई-ज़ीन टीम ( Swapnil Saundarya ezine Team ) की ओर से ऋचा जैन जी को ढेर सारी शुभकामनाएं व आभार . 


- ऋषभ शुक्ला ( Rishabh Shukla )
( संस्थापक - संपादक { Founder-Editor } ) 




 

A dedicated young Kathak dancer, Richa Jain started her formal training in Kathak at the tender age of 3 years, under the guidance of her parents; Kathak exponents Guru Shri. Ravi Jain (Disciple of Padmashree Shambhu Maharaj, Lucknow gharana and Alaknanda Devi of Benaras gharana) and Guru Smt. Nalini Jain (Disciple of Guru Sunder Prasad ji and Guru Kundan Lal Gangani, Jaipur Gharana). Because of her extensive training under her parents , Richa’s Kathak performances are a perfect blend of the lucknow , Jaipur and Benaras gharanas (Styles) of Kathak. She also received her initial vocal music training from Shri Ajit Kumar Mishra and later groomed in Hindustani classical music under the guidance of renowned Guru and exponent Shri A.Maheshwar Rao of the Gwalior Gharana.

Because of her training in Kathak and Hindustani classical vocal music, Richa has the unique feature of Dancing and singing simultaneously. She is one of the few dancers who exhibits this rare quality of dancing and singing simultaneously while presenting Abhinaya( Expressions) on Thumri, dadra, ghazals , geet etc.


Richa Jain has also been awarded the title of ‘Shringarmani ‘ by the Sur Singar Samsad, Mumbai in 2009. She has been a part of various dance workshops and has conducted lecture demonstrations. She has also worked as an assistant choreographer under her guru for various productions and telefilms. After graduating in commerce from Jesus and Mary College, Delhi University, Richa holds a Post-graduate Degree in commerce. She has also completed her Master’s in Kathak Dance and her Master’s in Hindustani Classical Vocal Music, from Gandharva Mahavidyalaya. 






Website :
www.richajain.net 
                                        
          




This Article has also appeared in Swapnil Saundarya ezine's Volume -3rd , Issue - 1st , 2015
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