Diary of Dr Akanchha Awasthi

Swapnil Saundarya ezine


 



Presents 

 
Diary of  Dr Akanchha Awasthi


( From the Desk of Swapnil Saundarya ezine  )







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स्वप्निल सौंदर्य ई-ज़ीन - परिचय

कला , साहित्य,  फ़ैशन, लाइफस्टाइल व सौंदर्य को समर्पित भारत की पहली हिन्दी द्वि-मासिक हिन्दी पत्रिका के तीसरे चरण अर्थात तृ्तीय वर्ष में आप सभी का स्वागत है .

फ़ैशन व लाइफस्टाइल  से जुड़ी हर वो बात जो है हम सभी के लिये खास, पहुँचेगी आप तक , हर पल , हर वक़्त, जब तक स्वप्निल सौंदर्य के साथ हैं आप.

प्रथम एवं द्वितीय  वर्ष की सफलता और आप सभी पाठकों के अपार प्रेम व प्रोत्साहन  के बाद अब स्वप्निल सौंदर्य ई-ज़ीन  ( Swapnil Saundarya ezine )   के तृ्तीय वर्ष को एक नए रंग - रुप व कलेवर के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है ताकि आप  अपनी ज़िंदगी को अपने सपनों की दुनिया बनाते रहें. सुंदर सपने देखते रहें और अपने हर सपने को साकार करते रहें .तो जुड़े रहिये 'स्वप्निल सौंदर्य' ब्लॉग व ई-ज़ीन  के साथ .
और ..............


बनायें अपनी ज़िंदगी को अपने सपनों की दुनिया .
( Make your Life just like your Dream World )



Launched in June 2013, Swapnil Saundarya ezine has been the first exclusive lifestyle ezine from India available in Hindi language ( Except Guest Articles ) updated bi- monthly . We at Swapnil Saundarya ezine , endeavor to keep our readership in touch with all the areas of fashion , Beauty, Health and Fitness mantras, home decor, history recalls, Literature, Lifestyle, Society, Religion and many more.

Swapnil Saundarya ezine encourages its readership to make their life just like their Dream World .
www.issuu.com/swapnilsaundaryaezine






Founder - Editor  ( संस्थापक - संपादक ) : 
Rishabh Shukla  ( ऋषभ शुक्ला )

 
Managing Editor (कार्यकारी संपादक) : 
Suman Tripathi (सुमन त्रिपाठी) 

 
Chief  Writer (मुख्य लेखिका ) : 
Swapnil Shukla (स्वप्निल शुक्ला)

 
Art Director ( कला निदेशक) :
Amit Chauhan  (अमित चौहान) 

 
Marketing Head ( मार्केटिंग प्रमुख ) :
Vipul Bajpai     (विपुल बाजपई)




'स्वप्निल सौंदर्य - ई ज़ीन ' ( Swapnil Saundarya ezine )  में पूर्णतया मौलिक, अप्रकाशित लेखों को ही कॉपीराइट बेस पर स्वीकार किया जाता है . किसी भी बेनाम लेख/ योगदान पर हमारी कोई ज़िम्मेदारी नहीं होगी . जब तक कि खासतौर से कोई निर्देश न दिया गया हो , सभी फोटोग्राफ्स व चित्र केवल रेखांकित उद्देश्य से ही इस्तेमाल किए जाते हैं . लेख में दिए गए विचार लेखक के अपने हैं , उस पर संपादक की सहमति हो , यह आवश्यक नहीं है. हालांकि संपादक प्रकाशित विवरण को पूरी तरह से जाँच- परख कर ही प्रकाशित करते हैं, फिर भी उसकी शत- प्रतिशत की ज़िम्मेदारी उनकी नहीं है . प्रोड्क्टस , प्रोडक्ट्स से संबंधित जानकारियाँ, फोटोग्राफ्स, चित्र , इलस्ट्रेशन आदि के लिए ' स्वप्निल सौंदर्य - ई ज़ीन ' को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता .


कॉपीराइट : 'स्वप्निल सौंदर्य - ई ज़ीन '   ( Swapnil Saundarya ezine )   के कॉपीराइट सुरक्षित हैं और इसके सभी अधिकार आरक्षित हैं . इसमें प्रकाशित किसी भी विवरण को कॉपीराइट धारक से लिखित अनुमति प्राप्त किए बिना आंशिक या संपूर्ण रुप से पुन: प्रकाशित करना , सुधारकर  संग्रहित करना या किसी भी रुप या अर्थ में अनुवादित करके इलेक्ट्रॉनिक या यांत्रिक , प्रतिलिपि, रिकॉर्डिंग करना या दुनिया के किसी भी हिस्से में प्रकाशित करना निषेध है . 'स्वप्निल सौंदर्य - ई ज़ीन ' के सर्वाधिकार ' ऋषभ शुक्ल' ( Rishabh Shukla )  के पास सुरक्षित हैं . इसका किसी भी प्रकार से पुन: प्रकाशन निषेध है.

चेतावनी : 'स्वप्निल सौंदर्य - ई ज़ीन '  ( Swapnil Saundarya ezine )   में घरेलु नुस्खे, सौंदर्य निखार के लिए टिप्स एवं विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों के संबंध में तथ्यपूर्ण जानकारी देने की हमने पूरी सावधानी बरती है . फिर भी पाठकों को चेतावनी दी जाती है कि अपने वैद्य या चिकित्सक आदि की सलाह से औषधि लें , क्योंकि बच्चों , बड़ों और कमज़ोर व्यक्तियों की शारीरिक शक्ति अलग अलग होती है , जिससे दवा की मात्रा क्षमता के अनुसार निर्धारित करना जरुरी है. 





संपादक की कलम से ........




प्रिय पाठकों .......
आप सभी को नमस्ते !



अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस ( 8 मार्च ) की आप सभी को हार्दिक बधाई . स्वप्निल सौंदर्य ई- ज़ीन की नव पेशकश 'आकांक्षा की डायरी से' में आप सभी का स्वागत है .  एक प्रतिष्ठित महाविद्यालय में प्रवक्ता के रुप में कार्यरत डॉ आकांक्षा अवस्थी , की डायरी के अनमोल पृष्ठों को स्वप्निल सौंदर्य ई-पत्रिका में प्रकाशित करने पर हमें हर्ष की अनुभूति हो रही है.  उनकी डायरी के पृष्ठों को पलटते हुए मुझे अनुभव हुआ कि आकांक्षा जी की डायरी का विधिवत सृजन कर इसे प्रकशित करना , बेहद सुखद व रोमांचक होगा. आशा करता हूँ कि स्वप्निल सौंदर्य की अन्य प्रस्तुतियों की तरह की ' आकांक्षा की डायरी ' भी आप पाठ्कों के प्रेम द्वारा सुपुष्पित हो जाएगी.

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर यदि  हम आज हमारे समाज में महिलाओं की शिक्षा ,नौकरी व उनके कार्यक्षेत्र में उनकी सफलता के संबंध में बात करें तो अक्सर देखने में आता है कि यदि किसी साधारण पुरुष पर किसी कामयाब व स्मार्ट महिला की थोड़ी सी भी कृपादृष्टि हो जाती है तो पुरुष अपने आप को धन्य समझने लगता है, गौरवान्वित महसूस करता है. ऐसी महिलाओं की दोस्ती पर उन्हें नाज़ होता है. वे खुले दिल से उनकी प्रशंसा करते है पर अफ़सोस , पत्नी की सफलता न स्वयं पुरुष  को रास आती है , न ही उसके परिवार को कोई विशेष सुख देती है या गौरव महसूस कराती है. बेटे के प्रमोशन पर दिल खोलकर खुशियाँ मनाई जाती है किंतु बहु के प्रमोशन पर थोड़ी सी खुशी ज़ाहिर करने के साथ साथ हिदायत भी दी जाती है कि प्रमोशन हुआ तो अच्छी बात है पर घर की ज़िम्मेदारियाँ भी बेहद जरुरी हैं.  40 वर्षीय योगिता ,पेशे से इंजीनियर हैं , पर उनके माता पिता आज दिन तक उनके लिए योग्य वर की तलाश में जुटे हैं . कारण, बेटी का 15 लाख का सालाना पैकेज है और चेहरे पर झलकता आत्मविश्वास उनकी कामयाबी की दशा व दिशा दोनों का ही परिचायक है.

अमूमन देखा जाता है कि आज की तारीख में लड़्कों को वर्किंग पत्नी तो चाहिये लेकिन ऐसी जिसका जॉब प्रोफाइल उनसे कमतर हो और जो विवाह के उपरांत पति व परिवार की इच्छा के मुताबिक अपना जॉब, अपनी विचारधारा , आदतें व स्वभाव बदलने के लिए तैयार हो. सोशल साइकोलॉजिस्टस  द्वारा किए गए अध्ययनों से भी यह बात साफ हो जाती है कि पुरुष अपने से कम कामयाब महिला की तरफ ज़्यादा आकर्षित होते हैं क्योंकि उन पर वे रौब जमाकर अपने अहम को संतुष्ट  करते  हैं.  आज भी ऐसे कई मुद्दे हैं जिनमें यह बात सामने आई है कि वर पक्ष योग्य कन्या से अधिक दान- दहेज व लड़्की के पेरेंट्स की प्रॉपर्टी व संपन्नता को ध्यान में रखता है .लड़्की की योग्यता व सफलता न तो कोई मायने रखती है और न ही उसका प्लस पॉइंट बन पाती है. इस तरह की बातों के दोष के घड़े को  पूर्णतया पुरुषों पर फोड़्ना गलत  होगा क्योंकि कहीं न कहीं लड़कियाँ  भी यही चाहती हैं कि उनका पति उनसे ज़्यादा काबिल और अधिक कमाता हो .कम काबिल लड़्कों को लड़्कियाँ खुशी से नहीं स्वीकारती हैं. वे खुद को दूसरे स्थान पर रखना पसंद करती हैं.
कुछ लोगों के निजि अनुभवों पर यदि गौर फरमाएं तो उनका मानना है कि कामयाब महिलाओं में एक एटीट्यूड आ जाता है . वो घर परिवार को अपने तरीके से चलाना चाहती हैं .यदि पति-पत्नी अकेले रहते हैं तो समस्याएं नहीं आती हैं वरना छोटी- छोटी बातों के कारण घर में अशांति का वातावरण बनने लगता है .
सफल  लड़कियों के प्रति बनी इस धारणा के कारण समाज में इस डर व दुविधा की स्थिति बनती जा रही है कि वो घर परिवार की ज़िम्मेदारी को उतनी अच्छी तरह नहीं निभा पाएंगी जितनी अच्छी तरह से एक साधारण लड़की निभाती है. पुरुष्  ऐसी लड़कियाँ जो कामयाब हैं उनसे दोस्ती तो रखना चाहते हैं पर उन्हें जीवनसंगिनी बनाने से कतराते हैं. विवाह के मामले में वे ऐसी लड़कियों को अधिक प्राथमिकता देते हैं जो शिक्षा  व कवालिफिकेशन में उनसे कमतर हों और जो करियर से ज़्यादा घर परिवार को  तवज्जो दें. इसके कारणों की यदि बात करें तो वे निम्नलिखित हैं :-

- अधिक सफल व  कामयाब लड़कियों की अपनी पहचान होती है .ऐसे में कोई पुरुष  नहीं चाहता कि वो पत्नी की पहचान से जाना जाए.

- पुरुष  की सोच उसकी परवरिश से बनती है . बचपन से ही कहीं न कहीं वो अपनी माँ को झुकते हुए देखता है और यही उसे ठीक लगने लगता है.

- पुरुष को महिलाओं की सफलता से ऐतराज़ नहीं .समस्या तब उत्पन्न होती है जब वो बराबरी में आकर आगे बढने लगती हैं . फिलहाल एक म्यान में दो तलवार तो रह नहीं सकतीं . घर का मुखिया तो किसी एक को ही होना होगा .स्त्री घर की  मुखिया बने ऐसी सामाजिक व्यवस्था निकट भविष्य में तो नज़र नहीं आती .

- आज लड़कियाँ पुरुष् समाज के लिए चुनौती बन रही हैं .उनकी  लगन व परिश्रम प्रशंसनीय है. ऐसे में बाहर की चुनौती व स्पर्धा के बाद पुरुष घर में ऐसी पत्नी चाहता है जो उसे सर्वेसर्वा माने .

यह सोच बेहद निंदनीय है . मैं, पुरुषों की व समाज की इस संकीर्ण व तुच्छ विचारधारा का खंडन करता हूँ . महिलाओं को भी अपने आप को महत्व देना जरुरी है . उन्हें चाहिये कि वे ऐसे जीवनसाथी  की तलाश करें जो उनके आँचल में खुशियों की सौगात भरने की क्षमता रखता हो , फिर वे खुशियाँ सिर्फ  नोटों की गड्डी , शॉपिंग ,गहने व अन्य लक्शरी द्वारा ही प्राप्त हों , ऐसी अपेक्षाओं के साथ यदि जीवनसाथी की तलाश करेंगी तो निश्चित ही धोखा व जीवन भर का दुख ही नसीब होगा और पुरुषों को चाहिये कि वे महिलाओं से हर पल उनके घर की ज़िम्मेदारियों को सँभालने के लिए  अपने सपनों का गला घोंट देने की अपेक्षा करते रहने की जगह बेहतर होगा कि अपनी पुरुषवादी सोच को दरकिनार कर अपनी काबिलियत के बल पर अपनी सफलता के परचम लहराएं और घर की ज़िम्मेदारियों को पूरा करने में अपनी भी सफल भागीदारी दर्ज कराएं . अपनी पत्नी के सपनों को भी उतनी ही अहमियत व तवज्जों दें जितनी आप खुद के सपनों को देते हैं. अपनी विचारधारा के स्तर को थोड़ा ऊँचा होने दें ,सुंदर सपने देखें और बनाते रहें अपनी ज़िंदगी को अपने सपनों की दुनिया.






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आकांक्षा की डायरी से



नमस्कार !

मेरा नाम आकांक्षा  है. सरस्वती महिला महाविद्यालय , कानपुर, उत्तर प्रदेश में गृहविज्ञान विभाग में बतौर प्राध्यापिका कार्यरत हूँ. मेरी स्नातक व परास्नातक स्तर की शिक्षा कानपुर के प्रतिष्ठित महाविद्यालय आचार्य नरेंद्र देव महिला महाविद्यालय ( ए.एन.डी कॉलेज नाम से प्रख्यात ) से संपन्न  हुई. अपने महाविद्यालय की गृह विज्ञान विभाग की शिक्षिकाओं से मैं बहुत प्रभावित थी. हमारे महाविद्यालय के गृह विज्ञान विभाग की विभागाध्यक्ष 'डॉ बी.के. बक्शी' जो  गृह विज्ञान विषय के नभमण्डल में चंद्रमा के समान सुशोभित हैं, जिन्हें किसी परिचय की आवश्यकता नहीं तथा उनके सहयोग में अन्य शिक्षिकायें 'डॉ गीता वर्मा' , 'डॉ नीरा नागरथ' तथा 'अर्चना मैडम' के निर्देशन में मैंने बहुत से  कार्यक्रमों का आयोजन किया  तथा उनसे बहुमूल्य अनुभवों को प्राप्त किया. मेरी शिक्षिकायें ही मेरा आदर्श थीं क्योंकि वे सभी गुरु शब्द का पर्याय थीं. जहाँ आज के आधुनिक समय में शिक्षा , विद्यालयो आदि के स्तर में गिरावट आने के साथ साथ, गुरु के पद पर आसीन शिक्षकों ने भी शिक्षा का व्यापारीकरण कर डाला है , जो बेहद शर्मसार कर देने वाला  काला सच है वहीं  मेरी किस्मत भली थी जो मुझे सच्चे गुरुओं का साथ मिला , जिन्होंने पग-पग पर मुझे प्रोत्साहित किया और मेरे समक्ष एक प्रेरणा के रुप में अपनी उपस्थिति दर्ज  कराई  और जीवन पथ पर अपना एक अलग मुकाम बनाने की राह दिखाई.  गृह विज्ञान विषय से एक अलग सा प्रेम होने के कारण मैंने इसी विषय में वाचस्पति (पी. एच. डी ) करने का निर्णय किया. मेरे समक्ष कठिनाईयाँ अनेक थीं पर कहते हैं , जहाँ चाह है वहीं राह है  और मैं, आकांक्षा आज अपने नाम के आगे 'डॉ' की उपाधि जोड़्कर एक अतुल्य संतुष्टि का अनुभव करती हूँ  जो सदैव मुझे गौरवान्वित करता है.

बचपन से ही मुझे डायरी लिखने का बहुत शौक था. विश्वास मानिये जब से होश संभाला है उस दिन से  लेकर अभी तक के एक एक दिन की यादों का सारा बही खाता आज भी मेरी अलमारियों व बक्सों में कैद हैं. गत माह 'स्वप्निल सौंदर्य लेबल' ( Swapnil Saundarya Label ) की ओनर 'स्वप्निल शुक्ला' ( Swapnil Shukla ) से मेरी मुलाकात हुई. किसी भी उद्यम को स्थापित करना एक साहस व जोखिम भरा काम है . पर स्वप्निल ( Swapnil Shukla ) और उनके भाई ऋषभ (Rishabh Shukla ), में एक  सफल उद्यमी होने के सभी गुण विद्यमान हैं तभी अल्प समय में ही अपने उद्यम को सशक्त रुप से स्थापित करने में ये सफल रहे हैं. स्वप्निल सौंदर्य लेबल ( Swapnil Saundarya Label )  उत्तर प्रदेश सरकार  द्वारा रजिस्टर्ड फर्म  है और इनके द्वारा निर्मित उत्पादों की देश के विभिन्न शहरों व बाज़ार में भूरी-भूरी प्रशंसा होती रहती है. स्वप्निल से विभिन्न विषयों पर वार्तालाप के दौरान  कला के प्रति मेरे रुझान व डायरी लेखन के अपने शौक की बात को जब मैंने उनसे साँझा की तब उन्होंने मेरी बात ऋषभ से कराई . ऋषभ शुक्ला (Rishabh Shukla ), स्वप्निल सौंदर्य लेबल के सह -ओनर व स्वप्निल सौंदर्य पत्रिका के संस्थापक-सम्पादक हैं . ऋषभ ने मेरी डायरी के कुछ चुनिंदा पृष्ठों को एक नव सेगमेंट के रुप में अपनी पत्रिका में स्थान देने की योजना के  बारे में मुझे बताया . मुझे उनका यह  सुझाव बेहद पसंद आया क्योंकि स्वप्निल सौंदर्य पत्रिका एक ऐसा सशक्त माध्यम है जिसके जरिये मैं अपने विचारों को पूर्ण स्वतंत्रता के साथ आप सभी के समक्ष प्रस्तुत कर सकती हूँ. विभिन्न लोगों के साथ जुडना व एक दूसरे की ज़िंदगी के अनुभवों से सीखना और आगे बढ़ना ,जीवन पथ पर आगे बढ़ने के लिए अहम है  और स्वप्निल सौंदर्य पत्रिका के जरिये मेरी ज़िंदगी में जुड़ने जा रहे इस नव अध्याय का मैं दिल खोल के स्वागत करती हूँ . मैं, स्वप्निल व ऋषभ जी के लिए शुक्रगुज़ार हूँ कि उन्होंने मेरी डायरी में लिखीं इन भूली बिसरी बातों को व यादों को , मेरे विचारों को एक खूबसूरत रंग में रंग कर इन्हें जीवंत कर दिया है और दिल से निकली व कलम के द्वारा अस्तित्व में आए मेरे इन विचारों को सजीव बना दिया है . प्रस्तुत है आप सभी के समक्ष मेरी डायरी का एक पृष्ठ , 'आकांक्षा की डायरी से' ( Diary Of Dr Akanchha Awasthi ).







झूठ के इस शहर में सच्चाई घुटने लगी
नफ़रतों के बादलों से बिजलियाँ गिरने लगीं
ये सितम कब तक  चलेगा जाने न ये कोई
सिहाजमे की कोख में अब बेटियाँ भी चुभने लगीं


महिला शिक्षा का मुद्दा एक लंबे समय से विवाद का कारण रहा है और ये सिर्फ भारत जैसे विकासशील देशों में नहीं बल्कि विकसित देशों में भी विवाद का विषय रहा है .हमारे पूरे समाज में 50 प्रतिशत महिलायें आज भी अपनी द्वितीयक शिक्षा नहीं ग्रहण कर पाती हैं फिर भी ये आंकड़े ये दर्शाते है कि स्कूली शिक्षा के कुछ अधिकतम वर्ष उनकी आय को 15 प्रतिशत तक बढ़ा देते हैं और इसी के साथ महिला शिक्षा और उनकी उन्नति विकास दर उनके जीवन के स्तर को भी एक उन्नत आय तक पहुँचा देती है .

कुछ पश्चिमी देशों में स्त्रियाँ पुरुषों से भी आगे हैं. यूनाइटेड स्टेट में आँकड़े कहंते हैं कि वहाँ महिलाओं ने 62 प्रतिशत एसोसिएट डिग्री , 58 प्रतिशत स्नातक डिग्रा, 60 प्रतिशत परास्नातक डिग्री तथा 50 प्रतिशत डाक्टरेट डिग्री  प्राप्त कर समस्त विश्व में एक आदर्श प्रस्तुत किया है. विकलांग महिलाओं हेतु भी शिक्षा का समुचित विकास हुआ. 2011 में यूरोप में प्रथम महिला जो कि डाउन सिन्ड्रोम बिमारी से ग्रसित थी परंतु स्नातक स्तर की शिक्षा प्राप्त की थी.




राजा राममोहन राय ने 1829 में ब्रह्म समाज की स्थापना की तथा बालविवाह का विरोध कर महिलाओं की शिक्षा  पर विशेष बल दिया था. बालिकाओं की शिक्षा पर प्रतिबंध लगाना, उनकी शिक्षा दीक्षा में हमारे समाज का नीरस बर्ताव निंदनीय  है . हमारे समाज में दहेज जैसी प्रथाएं आज भी विद्यमान हैं. अत महिलाओं की शिक्षा उनके भविष्य के लिए अत्यंत मह्त्वपूर्ण है क्योंकि जब महिलाएं शिक्षित होंगी  तभी वे आत्मनिर्भर होंगी एवं अपने साथ साथ अपने माता पिता का भी सहारा बनेंगी तथा आने वाले समय में दहेज जैसी कुरीतियों पर भी नियंत्रण पाया जा सकेगा. भारत एक पुरुष प्रधान देश है जहाँ चिरकाल से ही सत्ता पुरुष के हाथों में होती थी. इतिहास ,में नज़र डालने पर पता चलता है कि हमारे समाज में सती प्रथा, बाल विवाह जैसी कुरीतियाँ व्याप्त थीं.





वंश प्रथा भी हमारे समाज में एक बड़ी समस्या के अंतर्गत है जिसके तहत महिलाओं पर पुत्र जन्म पर विशेष बल दिया जाता है जिसके परिणामस्वरुप जनसंख्या जैसी समस्याएं भी पनपती हैं.ये सब समस्याएं अशिक्षित समाज का द्योतक हैं.बालिकाओं को सक्षम बनाने के लिए उन्हें अपने बल पर कुछ करने के लिए शिक्षा का अधिकार बहुत आवश्यक  है. जिसके तहत हमारे देश में सर्व शिक्षा अभियान चलाया जा रहा है जिसमें मध्यान्ह भोजन, निशुल्क शिक्षा हेतु भारत सरकार ने एक सराहनीय व अविस्मरणीय कार्य किये हैं.
विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में समय समय पर ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन होता रहना चाहिये जिससे हमारे समाज की युवतियाँ  सरकार द्वारा चलायी जाने वाली योजनाओं की जानकारी प्राप्त करती रहें तथा उन योजनाओं से वो कैसे लाभान्वित हो सकती हैं इस बात पर ध्यानाकर्षण करें.   

महिलाओं को शिक्षा व समानता  का अधिकार प्राप्त हो , यह बेहद आवश्यक है जिसके लिए समाज के साथ साथ महिलाओं को स्वयं जागरुक होना होगा व खुद को स्वावलंबी बनाने हेतु संघर्षरत रहना होगा . 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर एक दूसरे को बधाई देने से पहले महिलाओं के समक्ष खड़ी चुनौतियों से लड़ने के लिए  उचित व सार्थक कदम उठाना आज समय की माँग  है व स्त्री के अस्तित्व को बचाने के लिए आवश्यक भी. इसी के साथ मैं, आकांक्षा अपनी डायरी के इस पृष्ठ पर पूर्णविराम लगाती हूँ.

आभार.





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प्रिय पाठकों !

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