Diary of Dr Akanchha Awasthi


SWAPNIL   SAUNDARYA  e-zine 


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Diary of  Dr Akanchha Awasthi
आकांक्षा की डायरी से - V 






( From the Desk of Swapnil Saundarya ezine )
 





स्वप्निल सौंदर्य ई-ज़ीन - परिचय


कला , साहित्य,  फ़ैशन, लाइफस्टाइल व सौंदर्य को समर्पित भारत की पहली हिन्दी द्वि-मासिक हिन्दी पत्रिका के चतुर्थ चरण अर्थात चतुर्थ वर्ष में आप सभी का स्वागत है .

फ़ैशन व लाइफस्टाइल  से जुड़ी हर वो बात जो है हम सभी के लिये खास, पहुँचेगी आप तक , हर पल , हर वक़्त, जब तक स्वप्निल सौंदर्य के साथ हैं आप.

प्रथम, द्वितीय व तृतीय वर्ष की सफलता और आप सभी पाठकों के अपार प्रेम व प्रोत्साहन  के बाद अब स्वप्निल सौंदर्य ई-ज़ीन  ( Swapnil Saundarya ezine )   के चतुर्थ  वर्ष को एक नई उमंग, जोश व लालित्य के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है ताकि आप अपनी ज़िंदगी को अपने सपनों की दुनिया बनाते रहें. सुंदर सपने देखते रहें और अपने हर सपने को साकार करते रहें .तो जुड़े रहिये 'स्वप्निल सौंदर्य' ब्लॉग व ई-ज़ीन  के साथ .
और ..............

बनायें अपनी ज़िंदगी को अपने सपनों की दुनिया .
( Make your Life just like your Dream World ) 



Launched in June 2013, Swapnil Saundarya ezine has been the first exclusive lifestyle ezine from India available in Hindi language ( Except Guest Articles ) updated bi- monthly . We at Swapnil Saundarya ezine , endeavor to keep our readership in touch with all the areas of fashion , Beauty, Health and Fitness mantras, home decor, history recalls, Literature, Lifestyle, Society, Religion and many more. Swapnil Saundarya ezine encourages its readership to make their life just like their Dream World .

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Rishabh Shukla  ( ऋषभ शुक्ला )

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Suman Tripathi (सुमन त्रिपाठी)

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Swapnil Shukla (स्वप्निल शुक्ला)

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Amit Chauhan  (अमित चौहान)

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चेतावनी : 'स्वप्निल सौंदर्य - ई ज़ीन '  ( Swapnil Saundarya ezine )   में घरेलु नुस्खे, सौंदर्य निखार के लिए टिप्स एवं विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों के संबंध में तथ्यपूर्ण जानकारी देने की हमने पूरी सावधानी बरती है . फिर भी पाठकों को चेतावनी दी जाती है कि अपने वैद्य या चिकित्सक आदि की सलाह से औषधि लें , क्योंकि बच्चों , बड़ों और कमज़ोर व्यक्तियों की शारीरिक शक्ति अलग अलग होती है , जिससे दवा की मात्रा क्षमता के अनुसार निर्धारित करना जरुरी है. 





आकांक्षा की डायरी से ::  V




दूसरा दर्जा ............


लिंग की दृष्टि से समस्त समाज को दो भागों में विभक्त किया जाता है स्त्री व पुरुष . पुरुषों की बात की जाए तो समस्त विश्व में लंबे समय से पुरुषों का वर्चस्व रहा है और स्त्रियां सदियों से शोषण व उपेक्षा का शिकार होती रही हैं. इसी भेदभाव व उत्पीड़न ने महिलाओं को समाज में दूसरे दर्जे पर ला खड़ा किया है. समाज में दूसरे दर्जे का स्थान पाने वाली नारी जिसे सदैव समाज ने पुरुष के नीचे का दर्जा दिया है .यदि महिलाओं की भी बात की जाए तो उनकी सोच में ये बात बहुत सहज तरीके से देखने को मिलती है कि परिवार की चर्चा अथवा गणना के वक़्त वे स्वयं को सबसे नीचे रखना पसंद करती हैं.

हमारे समाज में आज भी एक ऐसी रुढ़िवादी  सोच से हमारा साक्षात्कार होता है तो बेहद निंदनीय है. जब बलिदान का समय आए तो नारी और जब सम्मान का समय आए तो पुरुष. वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो इस संदर्भ में  मुद्दों की एक लंबी फहरिस्त है.

उदाहारण स्वरुप , किसी परिवार में लड़्के को पढ़ाना हो और लड़की को भी पढ़ाना हो तो माता पिता लड़्की की पढ़ाई रुकवा कर या छोड़ने पर बाध्य करके लड़के की शिक्षा को प्राथमिकता पर रखते हैं .लड़की की इच्छा को क्यों नज़र अंदाज कर दिया जाता है या लड़्की की जायज़ इच्छओं का दमन कर लड़के की कर जिद को पूरा करना कहाँ तक न्यायसंगत है? ये प्रश्न मुझे झकझोर कर रख देते हैं.

जिस अधिकार को माँ बाप ने बेटी से छीन कर बेटे की झोली में डाला है , उसे वह भविष्य में कितना संभालेगा , कितना संजोएगा, ये बात सोचे  बिना माता पिता बेटी की इच्छा का गला घोंट देते हैं . सबसे बड़ी विडंबना तो यह है कि बेटियाँ भी इस बात को खुशी से स्वीकार कर लेती हैं और अपनी इच्छाओं का दमन कर देती हैं....

उपरोक्त उदाहरण हमारे समाज में बेहद सरलता से देखने को मिल जाते हैं. समाज का यह रवैया देख मन में हूक सी उठती है ... आखिर क्यों हर इम्तेहां व कुर्बानी के लिए इस दुनिया को औरत का ही पता याद रहता है. शारीरिक व मानसिक यातना , घरेलु हिंसा , बलात्कार , तेज़ाब काण्ड , गाली व अपशब्दों का प्रयोग, लैंगिक भेदभाव आदि तमाम मुद्दे सामने आते हैं जिसमें सिर्फ और सिर्फ नारी का ही शोषण होता है.

विवाह के पश्चात क्यों किसी लड़्की का उसके अपने ही घर परिवार पर से अधिकार खत्म हो जाता है ? क्यों उसके साथ अचानक महमानों की तरह बर्ताव किया जाने लगता है ? पुत्री उत्पन्न करने पर समाज औरतों को हीन दृष्टि से देखता है व उन पर ही ताने कसे जाते है जबकि विज्ञान में यह साबित हो चुका है कि लिंग निर्धारण सिर्फ पुरुष द्वारा ही संभव है. किसी नवविवाहिता के पति की मृत्यु हो जाने पर भी औरत पर ही लांछन लगाए जाते हैं . 'अपशकुनी ', 'अमंगली' , 'अभागन' आदि अलंकारों से उसे सैंकड़ों बार मारने के समान कटु वचन सुनाए जाते हैं. पुरुष शराब पीता है , परस्त्री संबंध बनाता है या सीधे शब्दों में कहा जाए तो बाहरी दुनिया में अपनी ज़िम्मेदारियां पूर्ण करने के स्थान पर अपना मुँह काला कराता फिरता है तो भी ताने औरत को ही सुनने पड़्ते हैं...." कैसी औरत है ..अपने पति को भी संभाल न सकी , अपना घर न बचा सकी ...पति को घर पर सब मिलता तो वह बाहर थोड़ी न प्यार के लिए तरसता".... . चरित्र हीन पुरुष है पर उसे चरित्र हीन बनने पर विवश किसने किया एक औरत ने . .....समाज की ऐसी कुत्सित विचारधारा पर घिन आती है. 

किसी औरत के साथ बलात्कार हो जाए तो भी गलती उस औरत की ही होती है. इसके विपरीत पुरुषों के लिए ऐसे कृत्य उनकी मर्दानगी में इज़ाफा करते हैं. एक पुरुष ने कितनी अधिक महिलाओं के साथ शारीरिक संबंध बनाए हैं , यह पुरुषों के पौरुष को बढ़ाता है और उंन्हें उनके 'सो कॉल्ड' मर्द होने का यकीन दिलाता है.

किसी औरत का गुरुर तोड्ने के लिए जब उसकी इज्जत को तार- तार किया जाता है , उसके चेहरे को ,उसके शरीर को तेजाब से जलाया जाता है तो समाज उस औरत को तिरस्कृत करता है ,यहाँ तक कि उसको मर जाने तक की नसीहत दी जाती है. और यदि वही औरत सजा के तौर पर  उसके अपराधी को दंड स्वरुप उसकी आँखों में तेज़ाब की चंद बूंदे डालने की कानून से माँग करती है तो यही समाज इसे अमानवीय कृत्य करार देता है  व स्त्री को उसके करुणामयी गुणों की याद दिलाने को आतुर हो जाता है .  बलात्कार के वक़्त एक स्त्री जिस दर्द , तकलीफ , घुटन का सामना करती है ....उसे जिस प्रकार खुद से घृणा हो जाती है ...उसे उसकी ज़िंदगी नर्क सी प्रतीत होने लगती है , उस पर समाज उसकी तकलीफ को समझने के स्थान पर सिर्फ मूक दर्शक बन  मज़े लेता है और मौका मिलने पर पीड़िता के जख्मों को कुरेदता रहता है. समाज उस पीड़िता की तकलीफ का खुलेआम लुत्फ लेना चाहता है पर यदि वही पीड़िता खुद की शक्ति को समेट कर अपने अपराधियों को सजा के तौर पर उनके निज अंगों को काट फेंकने की कानूनन  माँग करती है तो यही समाज उसके समक्ष क्रूर , ज़ालिम , औरत के नाम पर कलंक आदि दुर्वचनों की झड़ी लगा देता है.

एक औरत यदि माँ न बन पाए तो समाज उसे बाँझ जैसी हृदय भेदी गाली से संबोधित करता है , अपमानित करता है , भले ही शारिरिक दुर्बलता पुरुष में ही हो . हद तो तब हो जाती है जब पुरुष अपने शारिरिक परीक्षण के लिए भी न तो सरलतापूर्वक सुनना पसंद करते हैं और न ही इस बात को स्वीकरते हैं कि कमी उनमे भी हो सकती है.

प्रकृति की देन काया( शारीरिक संरचना) पर भी तंज कसने से बाज नहीं आता ये समाज. स्त्री यदि साधारण रंग रुप वाली , माँसल ( मोटी) ,कद में कम ( नाटी) या साँवली हो तो उस पर कटाक्ष किए जाते हैं . उसे विभिन्न नामों से पुकारा व उपहास का विषय बनाया जाता है. प्रोफेशनल जगत में यदि कोई महिला पुरुष के अधीन कार्यरत है अथवा पद में नीचे है तो उसका बॉस उसे अपनी निजि संपत्ति के नजरिये से देखता है व हर वक़्त मौके की तलाश में रहता है कि कब उसका शोषण किया जा सके .इसके उलट यदि किसी पुरुष को महिला के अधीन कार्य करना पड़े तो इससे उसके स्वाभिमान व अहम को ठेस पहुँचता है.

पुरुष प्रधान सामाजिक ताना बाना अर्थात पितृसत्तात्मक समाज लिंग आधारित भेद भाव का प्रमुख मुद्दा है. समाज में स्त्री की स्थिति महज एक पराश्रित जीवधारी की है.बाल्यकाल से किशोरावस्था व किशोरावस्था से वृद्धावस्था तक स्त्री पिता, भाई,पति व पुत्रों की आश्रित ही बनी रहती है. उसे लड़्कों के समान आत्मनिर्णय का अधिकार नहीं होता तथा उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह पुरुषों की हर रुप से सेवा करे तथा उनकी इच्छानुसार ही कार्य करे. इस पितृसत्तात्मक समाज के कारण औरतों  में बाल्यकाल से ही हीनता, दुर्बलता की भावना पनपने लगती है  और इसके चलते औरतों का शोषण और सुलभ हो जाता है. विवाह के मामले में भी प्रारंभ से ही औरतों की स्थिति दयनीय है. इतिहास साक्षी है कि स्त्रियों का विवाह माता पिता द्वारा झूठी प्रतिष्ठा , समझौते या शक्ति प्राप्ति के साधन के रुप में तय किया जाता रहा है. आज की युवतियों से उनकी पसंद नापसंद पूछने का रिवाज़ बहुत कम है . पति के मरने के बाद उसे विधवा के रुप में समस्त सांसारिक सुख सुविधाओं से परे करने का प्रयास किया जाता है बल्कि पत्नी की मृत्यु पर पुरुष पर ऐसे कोई प्रतिबंध नहीं होते . इसी प्रकार पुरुषों को कई पत्नियाँ ( नाजायज़ संबंध ) रखने में समाज को आपत्ति नहीं होती जबकि स्त्रियों के लिए ऐसा करने पर निंदनीय माना जाता है. समाज की यह दोहरी मानसिकता व संकीर्ण भावना शर्मसार कर देने वाली हैं. बहुतों को मेरी डायरी का यह पृष्ठ आसानी से हजम नहीं होगा पर यह हमारे ही समाज का आईना  है  जिसका  अक्स बेहद भयावह व रुह में कँपन पैदा करने वाला है. फैसला भी हम सब का ही है  , कि हम ऐसा भयावह अक्स दिखाने वाले आईने को  तोड़ दे ...या  समाज के इस भयावह रुप का स्वरुप ही बदल दें.



आभार.

डॉ आकांक्षा अवस्थी
सहा0 प्रवक्ता ( गृह विज्ञान विभाग )
सरस्वती महिला महाविद्यालय




A visit to Tryambakeshwar ( with my beloved hubby and my lifeline, my son ) which  is an  ancient  hindu temple in the town of Trimbak , in the Trimbakeshwar tehsil in the Nashik District of Maharashtra, India.










Dr Akanchha Awasthi is working as Ass. Professor  in the department of Home Science  at Saraswati Mahila Mahavidyala . She has  specialization in Women and child development and is well versed in the art of garment manufacturing . She has a keen interest in writing and has penned down several journals and research papers. She is the pen behind Diary of Dr Akanchha , a permanent section published regularly on Swapnil Saundarya ezine, which is an Indian Lifestyle magazine published bi monthly.








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