Yaadon ke Panno se ......by Swapnil Saundarya




SWAPNIL   SAUNDARYA  e-zine 

Presents 

यादों के पन्नों से..........................
Vol -04 , Year 2016 , Part - 1st





( From the Desk of Swapnil Saundarya ezine  )

 

 
स्वप्निल सौंदर्य ई-ज़ीन - परिचय 




कला , साहित्य,  फ़ैशन, लाइफस्टाइल व सौंदर्य को समर्पित भारत की पहली हिन्दी द्वि-मासिक हिन्दी पत्रिका के चतुर्थ चरण अर्थात चतुर्थ वर्ष में आप सभी का स्वागत है .

फ़ैशन व लाइफस्टाइल  से जुड़ी हर वो बात जो है हम सभी के लिये खास, पहुँचेगी आप तक , हर पल , हर वक़्त, जब तक स्वप्निल सौंदर्य के साथ हैं आप.

प्रथम, द्वितीय व तृतीय वर्ष की सफलता और आप सभी पाठकों के अपार प्रेम व प्रोत्साहन  के बाद अब स्वप्निल सौंदर्य ई-ज़ीन  ( Swapnil Saundarya ezine )   के चतुर्थ  वर्ष को एक नई उमंग, जोश व लालित्य के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है ताकि आप अपनी ज़िंदगी को अपने सपनों की दुनिया बनाते रहें. सुंदर सपने देखते रहें और अपने हर सपने को साकार करते रहें .तो जुड़े रहिये 'स्वप्निल सौंदर्य' ब्लॉग व ई-ज़ीन  के साथ .
और ..............
बनायें अपनी ज़िंदगी को अपने सपनों की दुनिया .
( Make your Life just like your Dream World )


Launched in June 2013, Swapnil Saundarya ezine has been the first exclusive lifestyle ezine from India available in Hindi language ( Except Guest Articles ) updated bi- monthly . We at Swapnil Saundarya ezine , endeavor to keep our readership in touch with all the areas of fashion , Beauty, Health and Fitness mantras, home decor, history recalls, Literature, Lifestyle, Society, Religion and many more. Swapnil Saundarya ezine encourages its readership to make their life just like their Dream World .

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Managing Editor (कार्यकारी संपादक) : 
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चेतावनी : 'स्वप्निल सौंदर्य - ई ज़ीन '  ( Swapnil Saundarya ezine )   में घरेलु नुस्खे, सौंदर्य निखार के लिए टिप्स एवं विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों के संबंध में तथ्यपूर्ण जानकारी देने की हमने पूरी सावधानी बरती है . फिर भी पाठकों को चेतावनी दी जाती है कि अपने वैद्य या चिकित्सक आदि की सलाह से औषधि लें , क्योंकि बच्चों , बड़ों और कमज़ोर व्यक्तियों की शारीरिक शक्ति अलग अलग होती है , जिससे दवा की मात्रा क्षमता के अनुसार निर्धारित करना जरुरी है.

 


 
 
यादों के पन्नों से..................
Vol -04 , Year 2016 , Part - 1st




यादों के पन्नों से निकल कर आया है यह अनमोल लेख जिसे स्व0 माधव प्रसाद मिश्र ( Late Madhav Prasad Mishra )जी द्वारा बेहद खूबसूरती से लिखा गया है . श्रीस्वामी भास्करानन्द सरस्वती जी के जीवन पथ की गाथा को बेहद  सौंदर्यपूर्वक तरीके से बयां करते इस लेख को पढ़ते हुए ऐसा प्रतीत होता है मानो मिश्र जी ने  शब्द रुपी मोतियों को धागों में पिरो दिया हो. स्व. माधव प्रसाद मिश्र जी ( Late Madhav Prasad Mishra ) आज हमारे बीच नहीं हैं पर साहित्य रुपी उनकी इस विरासत को उनकी पुत्री श्रीमती सुमन अवस्थी ( Mrs Suman Awasthi ) ने संजो कर रखा है.

सुमन जी से बातचीत के दौरान उनके पिता के बारे में गहराई से जानने को मिला. अपने पिता के व्यक्तित्व का चित्रण करते हुए उनकी आँखों से अश्रु रुपी मोती छलक पड़े . निसंदेह यह एक पुत्री का उनके पिता के प्रति असीम प्रेम ही है जो सुमन जी ने उनकी अनमोल साहित्यिक विरासत को प्रकाशित करवाने का निर्णय लिया.
 
 .


 
लखनऊ विश्वविद्यालय ( Lucknow University ) से  हिन्दी साहित्य ( Hindi Literature ) व अर्थशास्त्र  ( Economics )  में परास्नातक (डबल एम.ए) सुमन जी बताती हैं कि , पिताजी का जीवन अनेक कठिनाईयों से घिरा था. उनका जीवन अत्यंत संघर्षमयी था पर वे बेहद निडर थे. वे विलक्षण व्यक्तित्व के स्वामी थे. लखनऊ विश्वविद्यालय ( Lucknow University )  से  हिंदी साहित्य ( Hindi Literature )  में परास्नातक, " मेरे पिता ही मेरे जीवन का  आदर्श हैं. उनके जीवन में साहित्य का विशेष स्थान था . वे अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम साहित्य को ही मानते थे.  आज भी उनका जीवन मेरे लिए आदर्श है और मुझे इस बात पर गर्व है कि मैं उनकी पुत्री हूँ."

अपने पिता की इस अनमोल विरासत को हमारी पत्रिका के साथ साँझा करने का सुमन जी का यह निर्णय सराहनीय है . अपने पिता के साहित्य रुपी अनमोल खज़ाने को संजोना निश्चित रुप से कई लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगा.

प्रस्तुत है स्व माधव प्रसद मिश्र जी द्वारा श्रीस्वामी भास्करानन्द सरस्वती जी के जीवन पथ पर लिखा गया यह अनमोल लेख ..........
 
 
 

 
न 1833 के आश्विन मास  की एक शाम भगवान भास्कर अस्ताचल की ओर अग्रसर ,केवल अरुण विम्ब शेष है. पक्षी रात्रि विश्राम हेतु चहचहा रहे हैं. ग्रामपथ गौखुर की धूल से आच्छादित है. कानपुर जनपद के अंतर्गत मैथे गाँव के धर्मनिष्ठ ब्राह्मण पंडित मिश्रीलाल ईश्वर  चिंतन में लीन थे. उसी वेला में तीन तेजस्वी गैरिक वस्त्र धारी संत आकर खड़े हो गए. गृहस्वामी ने प्रणाम कर दर्शन के लिए आभार प्रकट किया. संतों ने मिश्रीलाल को आशीर्वाद देकर कहा, आज प्रभात में आपको पुत्र लाभ होगा जो करोंड़ों आप्तजनों को आनंद प्रदान करेगा . आप शिशु का सर्वप्रथम दर्शन मुझे कराइयेगा.  जन्म की सूचना देने पर आगंतुक संतों ने आँगन में लीप पोतकर धूप दीप युक्त विशेष पूजन किया. वह शुक्ल पक्ष सप्तमी का दिन था.

भगवान अशुंमाली की प्रथम किरणों के साथ पूरा गाँव मोद मग्न था. रहस्यमय संत तो ऊषाकाल के पूर्व ही तिरोहित हो गए. शिशु मोतीराम अदभुत प्रतिभाशाली एवं ईश्वरोन्मुख प्रवृत्ति का था. पिता ने उत्साह में मोतीराम को विद्याध्ययन के लिए काशी भेज दिया. 16 वर्ष की आयु में किशोर जब काशी से लौटा तो वैरागी प्रकृति देखकर पिता ने शीघ्र ही उसको विवाह बंधन में डालकर अपने को चिंता मुक्त कर लिया.

आज गृहस्वामी के घर में ढोलक बज रही है, स्त्रियाँ सोहर गा रही हैं. मिश्रीलाल के घर में पौत्र का जन्म हुआ है. घर में खुशियों का सागर लहरा रहा है किंतु नवजात शिशु का सत्रह वर्षीय पिता चिंतन में मग्न है,  क्या मैंने सोहर सुनने के लिए जन्म लिया है , मुझे तो वेदों की ऋचायें सुननी चाहिये थीं. मैं इसी समय माया के बंधन तोड़ दूँगा. अब मुझे एक क्षण भी यहाँ नहीं रुकना है. स्त्रियाँ अभी भी सोहर गा रही हैं किंतु किशोर के कानों में अब गीतों की ध्वनि धीमी होती जा रही है . उसके नंगे पैर महाकाल की नगरी उज्जैन की ओर बढ़ रहे हैं. जेब में एक भी पैसा नहीं है ,केवल आकाश वृत्ति का सहारा है. प्रात
गृहस्वामी के घर में पौत्र लाभ की खुशियां एवं पुत्र वियोग का विषाद एक साथ मनाया जा रहा है.एक दंपति को पुत्र का वियोग हुआ किंतु लाखों लोगों को निस्तार का मार्ग बताने वाले महान संत का अवतार हो गया.

महाराज श्री उज्जैन में घोर तपस्या करने लगे. घर त्यागने के समय जो वस्त्र पहने थे, वे जब जीर्ण शीर्ण होकर शरीर से अलग हो गए तो जनहीन शमशान में दिगंबर वास करने लगे. इच्छा होने पर रात्रि के निविड़ अंधकार में भगवान महाकालेश्वर के दर्शनों हेतु आ जाते थे. गुरुने कृपा पूर्वक  वेदों के अध्ययन के लिए निर्देश दिया. अब महाराज श्री का गुरुप्रदत्त नाम स्वामी भास्करानंद सरस्वती दिगदिगंत में फैलने लगा. सात वर्षों के वेदाध्ययन के पश्चात गुरु आज्ञा से दीर्घकाल तक देशाटन करने के पश्चात मुमुक्ष नगरी काशी की ओर प्रस्थान किया. इस यात्रा के मध्य महाराज श्री अपने गाँव भी पधारे . पिता और पुत्र दोनों ही संसार के बंधनों से मुक्त हो चुके थे. अपने ही घर से महाराज भिक्षा लेकर चले गए, किंतु परिजनों के विलाप से द्रवित न हुए.     

समस्त काशी नगरी में प्रचार था कि एक वस्त्र हीन साधु गंगा के उस ओर राम नगर क्षेत्र में वालुकामय तटपर विराजमान हैं. ज्येष्ठ मास की तपती लू की गर्म बालू और माघपूस के कड़ाके का शीत उस साधु के लिए एक समान थी. क्या खाते थे, क्या पीते थे किसी को पता नहीं. यदि कोई  श्रद्धालु स्वादिष्ट मिठाईयों का दोना लेकर जाता था , तो उसे देखकर मुस्कुराते हुए साधु दूर चले जाते . श्रद्धालुओं और जिज्ञासुओं द्वारा अधिक  परेशान किये जाने पर गंगाजी में कई दिन तक लकड़ी के लट्ठे की तरह तैरते रहते थे. कभी कभी जय विश्वनाथ का घोष मुँह से निकल कर गंगा तट्को गुँजरित कर देता था.


लेख जारी है.........................
- स्व0 माधव प्रसाद मिश्रा
लखनऊ
 उत्तर प्रदेश
 
 

यादों के कई पृष्ठ अभी खुलने बाकी हैं..............................तो  बने रहिये स्वप्निल सौंदर्य ई ज़ीन के साथ और बनायें अपनी ज़िंदगी को अपने सपनों की दुनिया.

 










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