उद्यमीयता विकास ( Entrepreneurship Development )




This apeared in  स्वप्निल सौंदर्य ई-ज़ीन :  Vol- 01, Issue- 03 , Nov- Dec 2013

उद्यमीयता विकास 



ह तथ्य सर्वविदित है कि किसी राष्ट्र के औद्योगीकरण में उद्यमी की मुख्य भूमिका होती है.  उद्यमीयता का विकास आर्थिक एवं सामाजिक  उत्थान के लिये अत्यंत आवश्यक है. कोई भी व्यक्ति मात्र जन्म से उद्यमी नहीं होता वरन उसमें उद्यमीयता के गुणों का विकास किया जा सकता है. उद्यमीयता के विकास से दो मूलभूत आवश्यकताओं का प्रतिपादन होता है:-

1- स्वरोजगार ( Self -employment )
2- आर्थिक लाभ ( Monetary benefits )



आर्थिक विकास के संबंध में सामान्य दृ्ष्टिकोण की बात करें तो हम देखेंगे कि यह बहुत पुरानी मान्यता है कि किसी देश का आर्थिक विकास  वहाँ के व्यक्तियों में उद्यमीयता का ही प्रतिफल है. असल में एन्ट्रीप्रिन्योर  का अध्ययन आधुनिक आर्थिक सिद्धांत के केन्द्रीय विषय का अध्ययन है और यह केन्द्रीय विषय अर्थशास्त्र ही है. इससे पूर्व कि हम व्यक्ति में छिपी उद्यमीयता की पहचान करें यह विचार करना आवश्यक है कि एक उद्यमी अथवा उद्योग साहसिक  कौन हो सकता है क्योंकि इस बात पर विचार भी उद्यमी को पहचानने का एक आवश्यक आधार है.

शब्द कोष की परिभाषा के अनुसार एन्ट्रीप्रिन्योर वह व्यक्ति है जो लाभ के लिए किसी उद्योग , व्यवसाय अथवा व्यापार को संगठित तथा संचालित करने का जोखिम उठाता है . एन्ट्रीप्रिन्योर शब्द की व्युत्पत्ति ' इन्टरप्राइज़ ' शब्द से हुई है जो संज्ञा के रुप में साहसी, कठिन व जोखिम पूर्ण कार्य तथा महत्वपूर्ण व्यवसाय का अर्थ देता है और विशेषण के रुप में इनका अर्थ होता है ऐसे व्यवसायों में साहसिकता की इच्छा तथा जोखिम उठाने की प्रवृ्त्ति .

सीधे शब्दों में उद्यमी वह व्यक्ति है जो किसी फर्म ( व्यवसायिक इकाई ) को संगठित करता है तथा उसकी उत्पादन क्षमता की वृ्द्धि करता है.

इसमे अतिरिक्त शब्द कोष में दिया गया एन्ट्रीप्रिन्योर  का अर्थ ही उसके विशिष्ट गुणों और कार्यों को स्पष्ट करत है जैसे :

1- वह उत्साही और निर्भीक होता है

2- जोखिम उठाने को तैयार रहता है

3- नए प्रयोगों के लिए प्रस्तुत रहता है

4- व्यवसाय  का संगठन एवं प्रबंधन करता है

5- यह सब करके लाभ अर्जित करने हेतु सदा जोखिम उठाने को तैयार रहता है.






- ऋषभ शुक्ला





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This apeared in  स्वप्निल सौंदर्य ई-ज़ीन :  Vol- 01, Issue- 04 , Jan- Feb  2014


  उद्यमी की पहचान : 


न्ट्रीप्रिन्योर की परख व पहचान के लिए अनेक प्रयास किये गए हैं. परंतु वे सब आर्थिक उत्थान तथा समाज व राष्ट्र की अवनति के कारणों का ही अन्वेषण तथा अभिज्ञान करते रहे. उद्यमी की ठीक - ठीक परख कर पाना कठिन कार्य है तथा कोई भी एक सिद्धांत ऐसा नहीं है जिसके द्वारा यतार्थ उद्यमी को उद्यमी का ढोंग मात्र करने वाले से अलग किया जा सके.  यह संभव है कि भविष्य में कोई ऐसा सिद्धांत विकसित किया सके परंतु तब तक विभिन्न पद्धतियों के सम्मिलित उपयोग पर ही निर्भर रहना होगा.

उद्यमीयता पर उपलब्ध सीमित साहित्य के अध्ययन से उसकी परख के तीन मार्ग दिखाई पड़ते हैं :

1- व्यक्तित्व के लक्षणों पर आधारित सिद्धांत :

आरंभ में उद्यमी के अध्ययन व परख के क्षेत्र में इसी पद्धति का बोलबाला रहा है और इसे मनोवैज्ञानिकों का समर्थन भी प्राप्त रहा. परंतु व्यक्तित्व के परीक्षण के जो साधन विकसित हुए वह न केवल अपर्याप्त थे वरन वे सभी परिस्थितियों मैं और सब जगह उपयोग किये जाने के लिए अनुपयुक्त भी थे, तथा बिना किसी  विशेषज्ञ के उन उपायों को व्यवहारित करना भी निरापद नहीं था. 

2- क्षेत्रीय सिद्धांत ( Field Theory ) :

इस सिद्धांत के अनुसार व्यक्तित्व के गुण या लक्षण उन सामाजिक परिस्थितियों से अटूट रुप से जुड़े होते हैं जिसमें व्यवहार व कार्य किया जाता है. वास्तविकता तो यह है कि सामाजिक परिसर से अलग व्यक्तित्व का उचित अध्ययन किया ही नहीं जा सकता . इस सिद्धांत से इस प्रश्न का उत्तर मिलता है कि ' भावी उद्यमी  कहाँ है ?' यह सिद्धांत इस बात पर बल देता है कि उद्यमी के चुनाव में उनके सांस्कृ्तिक तथा परिस्थितिजन्य कारकों पर ध्यान दिया जाना चाहिये और उद्यमी के विकास के लिए स्थानीय संसाधनों के आधार पर क्षेत्रों के विकास का मार्ग अपनाया जाना चाहिये. अनेक अध्ययनों द्वारा इस सिद्धांत की सार्थकता भी पर्याप्त मात्रा में सिद्ध हुई है.

3- कृ्त्य का सिद्धांत ( Role Theory ) :

यह सिद्धांत भावी उद्यमी की परख में उसके द्वारा किए गए या किए जा रहे कार्यों , व्यापारों और व्यवहार पर बल देता है. इसके द्वारा ' भावी उद्यमी  क्या कर रहे हैं ' इस प्रश्न का उत्तर मिलता है.


4- C.P.K.P. ( Choice of persons in key position )

इस सिद्धांत के अंतर्गत सर्वेक्षक किसी क्षेत्र विशेष के विकास कार्यों से संबद्ध महत्वपूर्ण व्यक्तियों से संपर्क द्वारा अनुरोध करता है कि वे अपने परिचितों में से कुछ ऐसे व्यक्तियों की सूची बना दें, जिनके विषय में वे सोचते हैं कि उनमें औद्योगिक इकाई को स्थापित करने की क्षमता व रुझान है . ऐसी कई सूचियों में जो नाम कई बार आयें , उनसे बातचीत करके उन्हें भावी उद्यमी के रुप में चुना जा सकता है .

अंत में यह कहा जा सकता है कि उद्योग साहसिक के भावी कृ्त्य का निरुपक, प्रशिक्षण , उद्यमी की परख और उसके विकास के लिए सशक्त उपाय है. कई संस्थाओं के अनुभव इस बात की पुष्टि करते हैं कि उद्यमियों की क्षमताओं को विकसित करने के लिए उन्हें  प्रशिक्षण  प्रदान  करना अति आवश्यक है . विगत कुछ वर्षों में इसी आशा से अनेक संस्थाओं ने भावी उद्यमियों के प्रशिक्षण का कार्य आरंभ किया है और सरकार उसके महत्व को समझते हुए उदारतापूर्वक वित्तीय सहायता दे रही है.


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- ऋषभ शुक्ला
( संस्थापक - संपादक )


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Presented and Posted By :

Swapnil  Shukla 







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